नए तरीके से होगी पुरानी जंग, गोगोई की पारिवारिक विरासत को मिली हिमंत ने चुनौती

गुवाहाटी: असम 1990 के दशक के मध्य में उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। उग्रवादी संगठनों के निशाने पर कांग्रेस के नेता थे। इस माहौल में हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। क्षेत्रीय दल असम गण परिषद (AGP) दूसरी बार सत्ता में लौटी। 22 अप्रैल 1996 को सैकिया के निधन के बाद पार्टी को संभालने की जिम्मेदारी तरुण गोगोई को सौंपी गई। उन्होंने एपीसीसी अध्यक्ष के रूप में लगभग पांच वर्षों तक संगठन को फिर से खड़ा करने में जुटकर काम किया। उनकी रणनीति और संगठनात्मक क्षमता का नतीजा 2001 में सामने आया, जब कांग्रेस ने एजीपी को हराकर सत्ता में वापसी की। इसके बाद गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार तीन कार्यकाल (2001–2016) तक असम पर शासन किया।

गौरव गोगोई के हाथों में कांग्रेस की कमान

करीब 25 साल बाद, असम एक बार फिर महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। 9 अप्रैल को राज्य की 126 विधानसभा सीटों पर एक चरण में मतदान होना है। इस बार कांग्रेस की ओर से नेतृत्व की कमान तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई के हाथों में है। पार्टी ने उन्हें एक साल पहले ही राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए भेजा था। अब यह सवाल उठने लगे है कि क्या वे अपने पिता की तरह संगठन को एकजुट कर पाएंगे। 2023 के परिसीमन के बाद गौरव गोगोई ने अपना लोकसभा क्षेत्र कलियाबोर से बदलकर जोरहाट कर लिया। कलियाबोर सीट समाप्त हो गई और उसकी जगह काज़ीरंगा नया संसदीय क्षेत्र बना।

गौरव गोगोई बनाम हिमंत बिस्वा 

जोरहाट को गोगोई परिवार का मजबूत गढ़ माना जाता है। यहां से उनके परिवार के सदस्य पहले भी चुनाव जीतते रहे हैं। 2024 का लोकसभा चुनाव गौरव के लिए खास था। क्योंकि यह उनके पिता के 2020 में निधन के बाद पहला बड़ा चुनाव था। उन्होंने यह सीट जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की। आने वाला 2026 विधानसभा चुनाव अब एक दिलचस्प मुकाबले के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ गौरव गोगोई और दूसरी ओर असम के मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा। राजनीतिक विश्लेषक इसे व्यक्तित्व की लड़ाई मान रहे हैं। कांग्रेस ने जोरहाट विधानसभा सीट से गौरव को उम्मीदवार बनाया है, जबकि सरमा लगातार उन पर राजनीतिक और व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं।

कई नेताओं ने छोड़ा कांग्रेस का साथ

इस बीच, कांग्रेस को आंतरिक चुनौतीयों का भी सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता, जैसे भूपेन कुमार बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई, पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। इससे संगठनात्मक स्तर पर गौरव की स्थिति कमजोर हुई है। दिलचस्प बात यह है कि हिमंत बिस्वा सरमा कभी कांग्रेस का ही हिस्सा थे और तरुण गोगोई सरकार में एक प्रमुख चेहरा माने जाते थे। लेकिन समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदले। आज वही सरमा कांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी बनकर सामने हैं।

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