भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच जिस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की चर्चा बरसों से फाइलों में दबी थी, उसने अब हकीकत की जमीन पर कदम रख दिया है। यह सिर्फ दो आर्थिक शक्तियों के बीच का समझौता नहीं है, बल्कि ग्लोबल इकोनॉमी की बिसात पर भारत की एक ऐसी चाल है जो चीन जैसे दिग्गजों को सीधे चुनौती दे रही है। लेकिन इस चमक-धमक वाली डील के पीछे क्या सब कुछ उतना ही सुनहरा है जितना कागजों पर दिख रहा है? आइए, इस ऐतिहासिक समझौते की बारीकियों को समझते हैं।
पक्ष: भारत के लिए क्यों है यह ‘मास्टरस्ट्रोक’?
इस डील के पक्ष में सबसे बड़ी दलील यह है कि भारतीय टेक्सटाइल, लेदर और ज्वेलरी जैसे सेक्टरों के लिए यूरोप का विशाल बाजार अब बिना किसी भारी टैक्स की दीवार के खुल जाएगा। अभी तक वियतनाम और बांग्लादेश जैसे छोटे देश जीरो-ड्यूटी का फायदा उठाकर हमसे आगे निकल रहे थे, लेकिन अब भारतीय सामान यूरोप के शोरूम्स में कम कीमतों पर मुकाबला कर पाएगा।एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे न केवल विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ेगा, बल्कि देश में लाखों नए रोजगार पैदा होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात ‘सर्विस सेक्टर’ की है; भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और इंजीनियरों के लिए यूरोप में काम करना और वहां अपनी सेवाएं देना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा। यह डील भारत को ‘ग्लोबल सप्लाई चेन’ में चीन के एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।
विपक्ष: कहीं हम अपनी संप्रभुता तो नहीं गंवा रहे?
सिक्के का दूसरा पहलू थोड़ा चिंताजनक है और यही वह हिस्सा है जिसे लेकर विपक्षी दल और किसान संगठन सरकार को घेर रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा भारत के डेयरी और कृषि क्षेत्र पर मंडरा रहा है। यूरोपीय देशों में खेती पर भारी सब्सिडी मिलती है, ऐसे में अगर वहां का सस्ता दूध, पनीर और अन्य कृषि उत्पाद भारतीय बाजारों में भर गए, तो हमारे छोटे किसानों की कमर टूट सकती है।दूसरा बड़ा मुद्दा ‘इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स’ (IPR) और दवाओं का है। जानकारों का कहना है कि यूरोप के सख्त पेटेंट नियमों के दबाव में आकर अगर भारत ने अपनी जेनेरिक दवाओं की नीति में बदलाव किया, तो देश में कैंसर और एचआईवी जैसी जानलेवा बीमारियों की दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएंगी। साथ ही, ईयू द्वारा लगाए गए ‘कार्बन टैक्स’ जैसे कड़े पर्यावरणीय मानक भारतीय लघु उद्योगों (MSMEs) के लिए एक नई मुसीबत बन सकते हैं, क्योंकि उनके पास इन मानकों को पूरा करने के लिए जरूरी बजट और तकनीक की कमी है।कुल मिलाकर, यह ट्रेड डील एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ जहां यह आधुनिक भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को पंख लगाती है, वहीं दूसरी तरफ यह मांग करती है कि हम अपने सबसे संवेदनशील वर्गों—किसानों और मरीजों—के हितों की सुरक्षा के लिए मजबूत सुरक्षा कवच तैयार रखें। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार विकास और सुरक्षा के बीच यह संतुलन कैसे साधती है।








