क्या है भारत और श्रीलंका के बीच में कच्चातिवु द्वीप विवाद

कच्चातिवु विवाद का मूल मुद्दा स्वामित्व से ज्यादा मछुआरों की आजीविका और पारिस्थितिकी से जुड़ा है, जो पॉक जलसंधि में मत्स्यन संसाधनों के क्षरण और राजनीतिक बयानबाज़ी से जटिल हुआ है। 1974 और 1976 के भारत–श्रीलंका समुद्री सीमा समझौतों में भारत ने कच्चातिवु को श्रीलंका की ओर स्वीकार किया और पारंपरिक मछली पकड़ने के अधिकार अस्पष्ट रहे, जिससे बाद में गिरफ्तारियों और तनाव में वृद्धि हुई।हालिया अपडेट में सितंबर 2025 में श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार डिसानायके ने कच्चातिवु का दौरा कर संप्रभुता पर जोर दिया, जिससे बहस फिर तेज हुई और भारत में तमिलनाडु की राजनीतिक मांगें पुनर्जीवित हुईं।तमिलनाडु विधानसभा ने मार्च–अप्रैल 2025 में द्वीप की वापसी की सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर केंद्र से समझौते की समीक्षा और मछुआरों–नौकाओं की रिहाई की मांग दोहराई।भारत सरकार का आधिकारिक रुख रहा है कि कोई भारतीय क्षेत्र औपचारिक रूप से नहीं सौंपा गया क्योंकि यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से विवादित था, साथ ही सरकार ने संसद और न्यायालयों में कहा कि कच्चातिवु श्रीलंका की सीमा रेखा के उस पार स्थित है और मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।सर्वोच्च न्यायालय में 1974/1976 समझौतों को चुनौती देने वाली याचिकाओं की अंतिम सुनवाई 15 सितंबर 2025 के लिए सूचीबद्ध होने की खबरों के बीच संवैधानिक वैधता पर बहस जारी है।विवाद का जमीनी पहलू तमिलनाडु के यांत्रिक बॉटम-ट्रॉलर्स का श्रीलंकाई जल में प्रवेश, श्रीलंका में 2017 से बॉटम-ट्रॉलिंग पर प्रतिबंध, प्रवाल और समुद्री पारिस्थितिकी को नुकसान, और गिरते मत्स्य भंडार के कारण बार-बार गिरफ्तारियों से जुड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल द्वीप की “वापसी” समाधान नहीं है; टिकाऊ मत्स्य प्रबंधन, वैकल्पिक जीविका, और संभव दीर्घकालिक लीज़/सह-प्रबंधन जैसी सहकारी व्यवस्थाएँ अधिक व्यावहारिक रास्ता हो सकती हैं।राजनीतिक पटल पर, भाजपा–कांग्रेस/डीएमके के बीच “द्वीप सौंपे जाने” की जिम्मेदारी पर आरोप–प्रत्यारोप होते रहे हैं, जबकि कूटनीतिक स्तर पर श्रीलंका का कहना है कि मुद्दा 1974 से तय है और कोई पुनर्विचार अपेक्षित नहीं है। तथ्यात्मक रूप से, कच्चातिवु 285 एकड़ का निर्जन टापू है जहाँ सेंट एंथनी का तीर्थ है, और दोनों देशों के श्रद्धालुओं–मछुआरों को पारंपरिक रूप से त्योहार के दौरान वीज़ा-छूट के साथ ठहरने/जाल सुखाने की सीमित अनुमति मिलती रही है, जो मत्स्य अधिकारों से अलग है।अभी की तस्वीर: श्रीलंकाई राष्ट्रपति का दौरा और तमिलनाडु के प्रस्तावों ने मुद्दे को फिर सुर्खियों में लाया है; अदालत में संवैधानिक समीक्षा लंबित है; और दीर्घकालिक समाधान के रूप में टिकाऊ मत्स्यन, प्रवर्तन समन्वय और सहकारी ढांचे पर जोर बढ़ रहा है।

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