हिन्दी साहित्य के ‘जादूगर’ और अपनी निराली शैली के लिए पहचाने जाने वाले वयोवृद्ध कवि और कथाकार विनोद कुमार शुक्ल अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर ने साहित्य जगत में एक गहरी रिक्तता पैदा कर दी है। रायपुर स्थित उनके निवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके जाने से उस पीढ़ी का एक बड़ा स्तंभ गिर गया है जिसने भारतीय साहित्य को एक नई दृष्टि और भाषा दी थी।विनोद कुमार शुक्ल महज एक लेखक नहीं थे, बल्कि वे शब्दों के जरिए एक अलग ही दुनिया रचने वाले शिल्पकार थे। 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे शुक्ल ने अपनी रचनाओं में जिस तरह की सादगी और जादुई यथार्थवाद का मिश्रण किया, वह अद्वितीय है। ‘नौकर की कमीज’ जैसा उपन्यास लिखकर उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं को जिस बारीकी से उकेरा, उसने उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। इस उपन्यास पर मशहूर फिल्मकार मणि कौल ने फिल्म भी बनाई थी, जिसे आज भी सिनेमाई कला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है।उनकी कविताएं हों या उपन्यास, उनमें छत्तीसगढ़ की मिट्टी की सौंधी खुशबू और एक आम आदमी के संघर्ष की गूंज हमेशा सुनाई देती थी। ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ जैसी उनकी कृतियां पाठकों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगी। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, मातृभूमि बुक ऑफ द ईयर और हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पेन/नाबोकोव जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था, लेकिन वे हमेशा प्रचार-प्रसार की चमक-धमक से दूर सादगी भरा जीवन जीते रहे।साहित्यिक गलियारों में उन्हें एक ऐसे रचनाकार के रूप में याद किया जा रहा है जिन्होंने भाषा को नया व्याकरण दिया। उनके वाक्यों की बनावट इतनी सरल होती थी कि पहली नजर में वे बच्चों जैसी मासूमियत लिए लगते थे, लेकिन उनके भीतर दर्शन की गहरी परतें छिपी होती थीं। उनके निधन पर देश भर के लेखकों, कवियों और उनके प्रशंसकों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। लोगों का कहना है कि शुक्ल जी भले ही शारीरिक रूप से चले गए हों, लेकिन उनकी ‘खिड़की’ से दिखने वाली दुनिया हमेशा पाठकों को सुकून और उम्मीद देती रहेगी।अंतिम समय में भी उनकी लेखनी सक्रिय थी और वे अपने प्रिय रायपुर में ही रहे, जिसे उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया था। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस मौलिकता का अंत है जिसने हिंदी लेखन को एक नया मुहावरा दिया।








