देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में अब जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायतों पर ‘सुपरफास्ट’ एक्शन होगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने अपने नए ‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’ को लागू कर दिया है। जहाँ एक ओर सरकार इसे कैंपस में समानता लाने वाला ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर इसके कुछ कड़े प्रावधानों को लेकर देश भर के शिक्षा जगत में बहस छिड़ गई है।क्या है नया नियम?यूजीसी के इस नए कानून का मुख्य उद्देश्य दलित (SC), आदिवासी (ST) और अब पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों व कर्मचारियों को कैंपस में होने वाले किसी भी तरह के भेदभाव से बचाना है। अब हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य होगा।कानून की 5 बड़ी और कड़वी बातें :- 24 घंटे में सुनवाई: शिकायत मिलते ही कमेटी को 24 घंटे के भीतर सक्रिय होना होगा। अब महीनों तक फाइलें नहीं दबेंगी।15 दिनों में फैसला: किसी भी शिकायत की जांच अधिकतम 15 दिनों में पूरी करनी होगी।OBC को मिला सुरक्षा कवच: पहली बार इस कानून के दायरे में विशेष रूप से OBC वर्ग के छात्रों को भी शामिल किया गया है।संस्थानों पर गिरेगी गाज: अगर कोई कॉलेज दोषी को बचाने की कोशिश करता है, तो यूजीसी उसकी मान्यता रद्द कर सकता है और सरकारी बजट (फंड) रोक सकता है।हेल्पलाइन और स्क्वाड: कैंपस में ‘एंटी-रैगिंग’ की तर्ज पर अब ‘इक्विटी स्क्वाड’ तैनात रहेंगे।विवाद की असली वजह क्या है?इस कानून को लेकर सबसे बड़ा विरोध “झूठी शिकायतों” की आशंका को लेकर हो रहा है। दरअसल, नए कानून में यदि कोई व्यक्ति किसी पर गलत आरोप लगाता है, तो उसके खिलाफ सजा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं रखा गया है। आलोचकों का तर्क है कि इससे निर्दोष शिक्षकों या छात्रों को निजी दुश्मनी के चलते फंसाया जा सकता है।साथ ही, सामान्य वर्ग के संगठनों का कहना है कि जांच कमेटी में सभी वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व होना चाहिए ताकि फैसला निष्पक्ष हो सके।पक्ष विपक्ष इस कानून पर जो भी हो लेकिन एक बात का ध्यान हमेशा रखा चाहिए कि शिक्षा का मंदिर सबके लिए समान होना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। यूजीसी का यह कदम उन हजारों छात्रों के लिए उम्मीद की किरण है जो भेदभाव के कारण अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं। लेकिन, कानून की सफलता इस बात पर टिकी है कि इसका इस्तेमाल ‘न्याय’ के लिए हो, ‘अन्याय’ के हथियार के रूप में नहीं।








