सुप्रीम कोर्ट ने अपोलो को लगाई फटकार, कहा मुफ्त इलाज नहीं दिया तो एम्स को सौंप देंगे, अस्पताल में दिल्ली सरकार की 26% हिस्सेदारी 

देश की राजधानी दिल्ली के नामी अस्पताल अपोलो को सुप्रीम कोर्ट ने दी चेतावनी। कोर्ट ने कहा है अगर इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में गरीब लोगों को मुफ्त इलाज मुहैया नहीं कराया जाता है तो वो एम्स से इसे अपने अधीन करने को कहेगा। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अस्तपाल से ये बात कही। बेंच ने लीज समझौते के उल्लंघन को गंभीरता से लिया, जिसके तहत इंद्रप्रस्थ मेडिकल कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईएमसीएल) द्वारा संचालित अस्पताल को 1₹ के लीज पर जमीन दी गई थी।

समझौते के तहत अस्पताल को अपने एक तिहाई गरीब मरीजों और 40 प्रतिशत बाहरी मरीजों को बिना किसी भेदभाव के मुफ्त चिकित्सा और अन्य सुविधाएं मुहैया करानी थी। पीठ ने सख्त रुख़ अपनाते हुए कहा, यदि हमें पता चला कि गरीब लोगों को मुफ्त इलाज नहीं दिया जा रहा है तो हम अस्पताल को एम्स को सौंप देंगे।

कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अपोलो ग्रुप का अस्पताल दिल्ली के पॉश इलाके में निर्मित है। इसे 1₹ के लीज पर दिया गया था। नो प्रॉफिट और नो लॉस के फॉर्मूले पर इसे चलाया जाना था, लेकिन ये एक कर्मशियल वेंचर बन गया है, जहाँ गरीब लोग मुश्किल से इलाज करा पाते हैं।

अस्पताल के वकील ने क्या कहा?

आईएमसीएल के वकील ने कहा कि अस्पताल एक संयुक्त उद्यम के रूप में चलाया जा रहा है और दिल्ली सरकार की इसमें 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है। उसे भी आय में बराबर का लाभ मिल रहा है। जस्टिस सूर्यकांत ने वकील से कहा, अगर दिल्ली सरकार गरीब मरीजों की देखभाल करने के बजाय अस्पताल से मुनाफा कमा रही है तो ये दुर्भाग्यपूर्ण बात है।

पीठ ने कहा कि अस्पताल को 30 साल के पट्टे पर जमीन दी गई थी जो 2023 में समाप्त होनी थी। कोर्ट ने साथ ही केंद्र और दिल्ली सरकार से यह पता लगाने को कहा कि उसका पट्टा समझौता नवीनीकृत हुआ या नहीं।

शीर्ष अदालत आईएमसीएल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अस्पताल ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 22 सितंबर 2009 के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि अस्पताल प्रशासन ने इनडोर और आउटडोर गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज मुहैया कराने के समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया है। इसने केंद्र और दिल्ली सरकार से पूछा कि अगर लीज समझौते को आगे नहीं बढ़ाया गया है तो जमीन के इस हिस्से के संबंध में क्या कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई है। 

37 साल पहले हुआ था 30 साल के पट्टे पर हुआ था करार

दरअसल 37 साल पहले अप्रैल 1988 में अपोलो समूह ने दिल्ली के उपराज्यपाल के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति के साथ एक अस्पताल बनाने के लिए 30 साल के पट्टे पर हस्ताक्षर किए। इस लीज डीड ने अपोलो ग्रुप और उसकी सहयोगी संस्थाओं को सरिता विहार में 15 एकड़ जमीन पर एक मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल बनाने की अनुमति दी।

लेकिन शर्त ये रखी गई कि 600 बिस्तर वाले मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल के कम से कम एक तिहाई हिस्से में निःशुल्क निदान सुविधाएँ प्रदान करने की जाए। साथ ही यह भी निर्धारित किया गया कि अस्पताल 40% ओपीडी रोगियों को निःशुल्क निदान सुविधाएँ प्रदान करेगा।

अब सर्वोच्च अदालत ने केंद्र और दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वे अस्पताल में बिस्तरों की संख्या और पिछले 5 सालों के ओपीडी मरीजों के रिकॉर्ड की गणना करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम नियुक्त करें। आदेश में कहा गया, “हलफनामे में यह बताया जाएगा कि पिछले 5 सालों में राज्य अधिकारियों की सिफारिश पर कितने गरीब मरीजों को इलाज मुहैया कराया गया”।

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