प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन दौरा 7 साल बाद द्विपक्षीय संबंधों में नया कदम माना जा रहा है, जहां तियानजिन में SCO शिखर सम्मेलन के इतर उनकी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात में सीमा शांति, आर्थिक सहयोग और रिश्तों के “प्रतिस्पर्धी नहीं, साझेदार” होने पर जोर दिखा। दौरे की मुख्य बातें मोदी तियानजिन पहुँचे और SCO शिखर सम्मेलन में भागीदारी के साथ शी जिनपिंग से द्विपक्षीय बैठक की, जो चीन में उनकी लगभग 7 वर्षों बाद पहली यात्रा है। बैठक में दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति-स्थिरता की अहमियत दोहराई और रिश्तों को सामान्य करने के उपायों की प्रगति को “सकारात्मक मोमेंटम” बताया।2020 के बाद से सीमा तनाव में कमी और 2024 में हुए डिस एंगेजमेंट के बाद शांति बनाए रखने को रेखांकित किया, साथ ही यह सहमति दोहराई कि मतभेद विवाद न बनें। शी जिनपिंग ने कहा कि चीन-भारत को प्रतिद्वंद्वी नहीं, साझेदार बनना चाहिए, जबकि मोदी ने सीमा पर शांति को रिश्तों की प्रगति की शर्त बताया। आर्थिक और कनेक्टिविटी के लिए PM मोदी ने चीन के साथ बड़े और लगातार व्यापार घाटे के मुद्दे को उठाया और कहा कि व्यापार बढ़ाने व घाटा घटाने से आपसी धारणा में सुधार होगा। सीमा व्यापार बहाली, प्रत्यक्ष उड़ानों की पुनर्बहाली और लोगों के बीच आदान-प्रदान बढ़ाने पर सहमति की हालिया प्रगति का उल्लेख हुआ। कूटनीतिक परिदृश्य का महत्व की बात करे तो दौरा ऐसे समय हुआ है जब भारत-अमेरिका व्यापार तनाव और अमेरिकी टैरिफ चर्चा में हैं, जिसके बीच बीजिंग में बहुपक्षीय समन्वय पर भी नजर रही। मोदी ने शी को भारत में 2026 के BRICS शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया; चीन ने भारत की BRICS अध्यक्षता के समर्थन का संकेत दिया। SCO शिखर सम्मेलन संदर्भ की बात करे तो मोदी ने SCO के औपचारिक कार्यक्रमों में भाग लिया, जहां रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई वैश्विक नेता मौजूद रहे; मोदी–पुतिन की द्विपक्षीय बैठक भी नियोजित हुई। मंच पर “ग्लोबल साउथ” देशों की भूमिका और बहुध्रुवीय व्यवस्था की चर्चा प्रमुख रही, जबकि आतंकी प्रायोजन पर कड़ा रुख और क्षेत्रीय स्थिरता पर बल दिखा। संदेश और महत्व दोनों पक्षों ने रिश्तों को “साझेदारी” की धारणा पर आगे बढ़ाने, सीमा प्रबंधन तंत्र को सशक्त करने और अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए मिलकर काम करने का संदेश दिया। दौरे को भारत-चीन संबंधों में “रुक-रुक कर आई नरमी” के बाद एक ठोस राजनीतिक संकेत माना जा रहा है, जिसकी अगली कसौटी व्यापार संतुलन, उड़ानों/वीजा सुगमता और सीमा वार्ताओं की गति होगी।








