नेपाल में जारी आंदोलन में युवाओं की अगुवाई वाले विरोध प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गए, जिनमें कम से कम 19 लोगों की मौत और सैकड़ों घायल हुए, जिसके बाद सरकार ने सोशल मीडिया प्रतिबंध वापस लिया और गृह मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। राजधानी काठमांडू समेत कई शहरों में कर्फ्यू लगाकर भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश हुई, जबकि प्रदर्शनकारियों का मुख्य फोकस भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और अभिव्यक्ति पर लगे नियंत्रण का विरोध रहा।आंदोलन का तात्कालिक कारण 4 सितंबर को 26 प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगा सरकारी प्रतिबंध था, जिसे युवाओं ने सेंसरशिप और जवाबदेही से बचने की कोशिश माना; व्यापक असंतोष पहले से बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक उदासीनता को लेकर simmer कर रहा था। बड़े जमावड़े संसद के बाहर नई बानेश्वर और मैतीघर मंडला पर हुए, जहां बैरिकेड तोड़ने की कोशिशों के बाद पुलिस ने आंसू गैस, वाटर कैनन, रबर बुलेट और कुछ स्थानों पर वास्तविक गोलियां भी चलाईं, जिससे हालात बेकाबू हुए।सोमवार की झड़पों के बाद काठमांडू में 17 और पूरब के इलाकों में 2 मौतें हुईं, 300–400 से अधिक लोग घायल बताए गए, जिनमें कई पुलिसकर्मी भी शामिल हैं; नागरिक अस्पताल परिसर में आंसू गैस घुसने की खबरों ने इलाज में बाधा पैदा की। मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र ने बल प्रयोग पर चिंता जताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की, जबकि रिपोर्टों में “ऊपर से सख्त कार्रवाई”के कथित आदेशों का भी जिक्र हुआ।हिंसा के अगले ही दिन सरकार ने सोशल मीडिया बैन हटाने की घोषणा की और वार्ता के संकेत दिए, वहीं कई जगह कर्फ्यू के बावजूद जेन-ज़ी समूहों ने “स्टूडेंट्स को मत मारो” जैसे नारे लगाते हुए रैलियां जारी रखीं। स्थानीय मीडिया और कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में शीर्ष नेताओं के घरों और पार्टी दफ्तरों पर हमला व आगजनी की घटनाएं दर्ज हुईं, जिससे राजनीतिक संकट और गहरा हुआ तथा सभी-दल बैठक और नेतृत्व पर सवाल तेज हुए।








