14–15 मार्च 2025 की रात दिल्ली उच्च न्यायालय बेंच के उनके सरकारी निवास में आग लगी। अग्निशमन कर्मियों ने एक स्टोर रूम में ₹500 के आधे जले नोटों के ढेर देखे।सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने पाया कि यह स्टोर रूम पूरी तरह से न्यायमूर्ति वर्मा और उनके परिवार के नियंत्रण में था तथा नोट वहां उनके या परिवार की सक्रिय सहमति से ही पहुँच सकते थे।समिति ने इन तथ्यों को “गंभीर दुराचार (serious misconduct)” माना और हटाने की सिफारिश की।जस्टिस वर्मा से पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के ही एक और सिटिंग जज जस्टिस शेखर कुमार यादव को भी पद से हटाने की मांग उठी थी। उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को लेकर एक टिप्पणी की थी, जिसके बाद विपक्ष ने उन्हें न्यायपालिका से हटाने की मांग की थी।उन्होंने UCC को जरूरी बताया, मुस्लिम समुदाय की परंपराओं पर सवाल उठाए, बहुसंख्यक की इच्छा को प्राथमिकता दी, और समुदाय विशेष के लिए अपशब्दों का उपयोग किया, जो न्यायिक निष्पक्षता के मानदंडों के खिलाफ मानी जा रही हैं।








